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एक पुलिस वाले ने खून दे बचाई पीड़ित की जान, यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स काउंसिल की पहल पर कोतवाली में तैनात सब इंस्पेक्टर ने की अच्छी पहल

एक पुलिस वाले ने खून दे बचाई पीड़ित की जान, यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स काउंसिल की पहल पर कोतवाली में तैनात सब इंस्पेक्टर ने की अच्छी पहल

संजय दीक्षित
हाथरस 05 अपै्रल। अभी तक आपने वर्दी को लेकर तमाम नेगेटिव चर्चाएं सुनी होंगी, लेकिन आज हम वर्दी से सुसज्जित सांगवान जी को सलाम करते हैं। आज के कृत्य से चेहरे की किताब पर आज जो हुआ वह मानवीय संदेश की वह घटना थी। हम चाहें तो पुराने एक फिल्मी गीत के लहेजे में कहें तो कुछ इस प्रकार होगी ‘‘मानो तो मैं गंगे मैया, न मानो तो वहता पानी’’ अर्थात सामाजिक संस्था की पहल और एक अधिकारी की कर्तव्य निष्ठा के जो दर्शन हुए वह वाकई सम्मान की दृष्ठि वंदनीय है। 
ऑन लाइन को लेकर तमाम चर्चाएं चलती हैं। बात अगर संस्कारों की करें तो सीखने को बहुत कुछ मिलता है। अगर नेगटिव लें तो जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं। अगर समझ में आए तो वंदन और न आए तो रघुनंदन। कुल मिलाकर घटना यह है कि फेसबुक पर समाजिक संस्था ‘यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स काउंसिल’ के सदस्य प्रवीन वार्ष्णेय ने यह डाला था कि एक जरूरतबंद व्यक्ति के लिए हाथरस में एक नेगेटिव ब्लड की आवश्यकता है। प्रवीन जी द्वारा एक मैसेज डाला गया तो काफी लोगों ने पढ़ा, लेकिन हाथरस कोतवाली में तैनात सब इंस्पेक्टर राहुल सांगवान ने इस पर प्रतिक्रिया की। उन्होंने फोन पर बताया कि ‘ए- नेगेटिव ब्लड मेरा है’ उन्होंने जानकारी करते हुए जरूतबंद को वह रक्त दिया जिसकी अगर तुलना की जाए तो मुल्य निर्धारण नहीं कर सकते। क्योंकि सांगवान जी का वह कार्य अमूल्य है। उन्होंने महान रक्तदान में सहभागिता कर मानवीय प्रेरणा ही जार नहीं की बल्कि सभी युवाओं को भी एक अच्छा संदेश जारी किया है। इस संबध्ां में ‘यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स काउंसिल’ तो सांगवान जी का साधुवात करती ही है साथ ही आज वह हाथरस के ही नहीं चेहरे की बुक में युवाओं के व अन्य साथियों के भी सरआंखों पर हैं।
वैसे सांगवान जी के संबंध में यह सुनने भी मिलता है कि यदि कोई दुकानदार या ढकेल वाला उनसे वस्तु के बदले पैसा नहीं लेता है तो वह वहां से खरीदारी नहीं करते।
क्या कहते हैं लोगः- 
वाकई सांगवान जी सराहना के पात्र हैं। यह एक प्रेरणादयक पोस्ट है। निश्चित ही युवा वर्ग के लिए सांगवान जी ने अच्छा संदेश दिया है। हम नमन करते हैं ऐसी सोच ओर कर्तव्यनिष्ठा को। सांगवान जी की सोच और प्रवीन जी की पहल जब दोनों मिली तो निश्चित ही मानवता के दर्शन हुए हैं। हों क्यों न यह दोनों ही सनातन धर्म के सार्थी जो हैं। मैं इस घटना को अपनी स्टोरी में स्थान दे रहा हैं। जय भारत जय सनातन धर्म

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