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225 वर्षों के इतिहास को संजोए है मंदिर श्री दाऊजी महाराज

हाथरस का इतिहास और किला
225 वर्षों के इतिहास को संजोए है मंदिर श्री दाऊजी महाराज
संजय दीक्षित
दाऊ दाऊ सब कहें मैया कहै न कोय।
दाऊ के दरबार में मैया कहे सो होय।।
प्रस्तावना
मंदिर में विराजित भगवान
बलभद्र व माता रेवती की मूर्तियां
जय श्री राधे। हमारे हाथरस के संबंध में तमाम लोगों ने अपने-अपने स्तर से जानकारी मुहैया कराते हुए मुद्रण कराई है। हम उन विद्वजनों को भी नमन करते हैं और जो अध्ययन से मिला है उसको शब्दों और वाक्यों में उकेरने का प्रयास कर रहे हैं।

हाथरस 30 अगस्त, 18। करीब 225 वर्ष के अपने गौरवमई इतिहास को सजोए हुए हाथरस के इतिहासिक किले से ही हाथरस नगर की प्रथम पहचान है। इसके इतिहास में एक नया अध्यक्षय उस वक्त और जुड़ गया जब तत्कालीन तहसीलदार ने 1912 में चमत्कार को नमस्कार करते हुए प्रथम मेला श्री दाऊजी महाराज का शुभारंभ किया।
मेला की परपाटी में कौन-कौन रहे शामिलः-
हालांकि वार्षिको उत्सव तो पूर्व के सैकड़ों वर्षों से मन रहा था लेकिन प्रथम मेला श्री दाऊजी महाराज को वार्षिकोत्सव के रूप में मनाने का श्रेय तो
प्रो.चिंतामणि शुक्ल (फाइल से)
तत्कालीन तहसीलदार बाबू श्यामलाल जी को जाता है उन्होंने 1912 में इस की शुरूआत की। इसमें गनेशीलाल मुख्तार जी का अतुलनीय सहयोग रहा। जबकि 1951 में इसको ख्याति उस वक्त मिली जब हाथरस के सेठ बाबूलाल ने भी इस मंदिर के उत्थान के लिए कार्य किया। 1953 में डॉ. हरवंशलाल ने तत्कालीन प्रदेशीय मंत्री मोहनलाल गौतम को यहां बुलाया और मेले को और ऊंचाइयां मिलीं। इसके अलावा मेले के उत्थान में लाखनू के राजा मान सिंह जी का योगदान भी प्रशंसनीय रहा है। इसके बाद शहर के अनगिनत व्यापारी और समाजसेवियों का सहयोग भी वंदनीय रहा है।
प्रारंभ में कब से आरंभ होता था मेला श्री दाऊजी महाराज आरंभः-
पूर्व के इतिहास में देखें तो मेला का शुभारंभ गणेश चौथ से होता था जो आज भी संचालित है। जबकि समापन भादों सुदी 15 यानि पितृपक्ष की पूर्णिमासी तक मेले का सापन हो जाता था, लेकिन अब समय के साथ-साथ मेला प्रशासन इसको बढ़ा भी देता है।
इसके इतिहास के संबंध में देखा जाए तो कोई खास प्रमाण तो नहीं मिलते, लेकिन अलीगढ़ गजीटियर में इसका उल्लेख किया गया है। जबकि प्रो.चिंतामणि शुक्ल की लेखनी में भी हाथरस किला और हाथरस से जुड़े स्वतंत्रता सेनानियों की जानकारी मिली है। हम नमन करते हैं प्रो. चिंतामणि की उस लेखनी को जिससे हमको आज यह जानकारी उपब्ध हो पा रही है।

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