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पहला मेला श्रीदाऊजी महाराज संपन्न हुआ था छह सौ रुपये एक आने में, अब ठेका ही उठा एक करोड़ एक लाख का

600 रुपये में संपन्न होने वाले मेला श्रीदाऊजी महाराज का ठेका ही उठा इस वार एक करोड़ एक लाख का
-दूसरे मेले पर खर्च आया था महत छह सौ रुपये सात आने, जबकि चंदा हुआ था 913 रुपये 3 आने
-महज 32 रुपये में हो गई थी मंदिर परिक्षेत्र की रंगाई-पुताई, अब होते हैं लाखों खर्च

Hathras 22 सितंबर, 18। छह सौ बनाम एक करोड़ एक लाख। भगवान शिव की कामाना का इतिहास निराला है। मतलब ब्रज का द्वार यानि ‘‘हाथरस’’। माता हाथुरसी मंदिर से ही ब्रज की हद शुरू हो जाती है
शशीकांत गौतम, मेला सहयोगी
और यहीं से शुरू होता है रस की नगरी हाथरस का इतिहास। मां के मंदिर से चंद कदमों की दूरी पर बने रोहिणी के लाला का ऐतिहासिक मंदिर का इतिहास तो इतना है की बखान ही  नहीं हो सकता, लेकिन एक पहलु को ही उठाकर देखलें तो आंखे फटी की फटी रह जाती हैं। हम बात कर रहे हैं ऐतिहासिक मंदिर श्री दाऊ जी महाराज मंदिर के मेले की। जहां पहला मेला मात्र छह सौ रुपये में संपन्न हुआ था, लेकिन 107 वें मेला का ठेका ही एक करोड़ एक लाख का उठा है।
विद्यासागर ‘विकल’ मेला जानकार
मेले के इतिहास को खंगालें तो महंगाई का परिमाप निकल कर सामने आता है। इतिहास के पन्नों को उठाया तो पता चलता है कि पहला मेला श्री दाऊजी महाराज मात्र छह सौ रुपये में संपन्न हो गया था, लेकिन वर्ष 2018 यानि 107 मेले का ठके की बोला एक करोड़ दस लाख में रुकी तो सभी दंग रह गए। हालांकि सूत्र बताते हैं, कि प्रशासन ने बाद में नौ लाख रुपये और कम कर दिए। इसलिए वर्तमान मेले का ठेका एक करोड़ एक लाख का होता है। जबकि तत्कालीन तहसीलदार बाबू श्यामलाल के प्रयाशों से वर्ष 1912 में लगने वाले मेले का कुल खर्चा ही 600 रुपये आया था। बनाम एक करोड़ एक लाख।
हर वर्ष बढ़ी महंगाई और मेले का क्षेत्रफल सिकुड़ता गया
सूत्रों से यह तो पता चलता ही है कि मेला का प्रथम बजट महज छह सौ रुपये था, लेकिन जब दूसरा मेला संपन्न हुआ तो खर्चा भी बढ़ गया। जबकि इस बार मेला आयोजन तत्कालीन तहसीलदार के अलावा आयोजन में सेठ चिरंजीलाल बागला, मान सिंह व गनेशीलाल मुखत्यार भी जुड़ गए और गनेशीलाल की लेखनी के मुताबिक वर्ष 1913 में मेले के चंदे में कुल 913 रुपये तीन आने का चंदा हुआ। जबकि मेला मात्र चार दिन ही आयोजित हुआ था। 4 सितंबर को आरंभ होकर 8 सितंबर को संपन्न होने वाले इस मेले में कुल खर्च छह सौ रुपये सात आने का खर्च आया था। जबकि 160 रुपये चार आने शेष बचे थे। इन पैसों से ही मंदिर की तिदरियों का निर्माण कराया गया। जहां पर बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को रुकने की व्यवस्था होती थी।
मेला के 100 पूर्ण होते ही महंगाई ने भरी उछाल
लगातार मेले का आयोजन होता रहा और कुछ न कुछ बढ़कर मेले का ठेका बढ़ता ही गया, लेकिन वर्ष 101 वें मेले में अचानक 28.50 लाख से बढ़कर मेला का ठेका 44 लाख पर जा पहुंचा और मौका मिला राजीव एंड कंपनी को। जबकि 100 वें वर्ष का ठका महत 28 लाख 50 हजार में उठा था।
1913 में मंदिर पर हुई रंगाई-पुताई का खर्च महज 32 रुपये आया था
ऐतिहासिक मंदिर श्री दाऊजी महाराज पर 1913 में अगर रंगाई-पुताई का खर्च देखें तो महज 32 रुपये 50 पैसे आया था। जबकि आज के वक्त में दसियों लाख का खर्च मंदिर की रंगाई और पुताई पर आता है। बढ़ती महंगाई को भले ही कोई न आंक पाए, लेकिन मेले के इतिहास को उठाते हैं तो महंगाई की दर ने आसातीत परिचम फहराया है।
                                                                                         संजय दीक्षित-8630588789

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