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हाथरस में 202 वर्ष पूर्व तबाही की तारीख बनी थी दो मार्च

दो मार्च पर विशेष.....................................
हाथरस में 202 वर्ष पूर्व तबाही की तारीख बनी थी दो मार्च
-शरणार्थियों को शरण देने से चिढ़ गया था अंग्रेजी शासन
-गद्दारी न होती तो हाथरस भी एक अलग रियासत के रूप में विलय होता भारत में
संजय दीक्षित
ऐतिहासिक किला स्थित मंदिर श्रीदाऊजी महाराज
जिसकी प्राची पर दागे थे अंग्रेजों ने गोले
हाथरस 02 March, 19। तख्त के ताज को तबाही की तारीख ने तमाम उम्मीदों पर उस वक्त विराम लगा दिया था जब एक गद्दार ने बारूद में आग लगा दी थी। गद्दार की गद्दारी से हाथरस का पूरा किला तो ध्वसत हो ही गया था। साथ ही गद्दार भी उसी बारूद की आग में जलकर सैकड़ों सेनिकों के साथ जल मरा था। ब्रज की द्वार देहरी आज भी 2 मार्च, 1817 की उस भयंकर तबाही की सोच कर कांप उठता है।
प्रो. चिंतामणि शुक्ल की कलम से मिली तबाही की तारीख 
ब्रज की द्वार देहरी (हाथरस) के लिए 02 मार्च किसी काले इतिहास से कम नहीं है। क्योंकि 02 मार्च, 1817 की शाम जब सूर्य अस्ताचलगामी होने जा रहे थे। हाथरस
यह बारूद का वह गोला है जो सासनी से
मंदिर श्रीदाऊजी महाराज दागा गया था
शहीद काले खां की मजार
के वीर सपूत अंग्रेजों पर विजय की खुशी मना रहे थे तभी एक भयंकर विस्फोट हुआ और सबकुछ ध्वस्त हो गया। कुछ पल में ही प्रयकारी मंजर था। सब ओर चीख-पुकार थी। सैनिकों व प्रजा के क्षत-विक्षप्त शरीर और रक्तरंजित शव पड़े थे। साथ ही हाथरस का सुदृढ़ मलबे के रूप में तब्दील हो चुका था।
जाटों की मजबूत किलाबंदी पर मार्शल की कूट नीति पड़ी भारी
प्रो.चिंतामणि शुक्ल रचित साहित्य को जब कोई पढ़ता है तो बरबस ही सिहर उठता है। क्योंकि जा शब्द पन्नों पर उकेर दिए जाते हैं वही आगे
चलकर इतिहास के गवाह बन जाते हैं। वह पल और उस वक्त के लोग भले ही भले
शूरवीर राजा दयाराम
सिंह ठेनुआ का छविचित्र
ही वर्तमान में न हों, लेकिन पन्नों पर उकेरे हुए शब्द इतिहास को आज में महसूस करा देते हैं। ऐसा ही दृश्य उस वक्त सामने
होता है, जब जाटों की रणभूमि रहे हाथरस नगर के इतिहास को जब लोग पढ़ते हैं।
Sanjay Dixit
प्रो.चिंतामणि शुक्ल के मुताबिक 17 फरवरी, 1817 मेजर जनरल मार्शल के नेतृत्व में हाथरस के मजबूत किले की अंग्रेजी सेना ने घेराबंदी शुरू की थी। साथ ही राजा दयाराम के समक्ष आत्मसमर्पण का प्रस्ताव भी रखा था। जबकि राजा और मजबूत किलेबंदी के तहत अंग्रेजी सेना को 7 दिन के युद्ध में बुरी तरह से पीछे ढकेल दिया, लेकिन कुछ देशद्रोही
अंग्रेजों से जा मिले। जिसके तहत एक देशद्रोही ने किले के भयंकर बारूदखाने में आग लगा दी। जिसके तहत जीती बाजी होने के बाद भी राजा दयाराम को पराजय का मुंह देखना पड़ा और 02 मार्च, 1817 की शाम हाथरस के लिए एक काले इतिहास के रूप में दर्ज हो गई।

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