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तीन मार्च, 1817 था होली पर्व के लिए काला इतिहास

तीन मार्च, 1817 था होली पर्व के लिए काला इतिहास
संजय दीक्षित

अंगे्रजों के तोप गोलों से हुए मंदिर की प्राची में होल
हाथरस। करीब 20 दसक पूर्व एक गद्दार द्वारा ऐसी होली जलाई थी कि कई सप्ताह तक उसकी आग ठंडी नहीं हो पाई थी। ब्रज की द्वार देहरी ‘हाथरस’ का भी एक इतिहास ऐसा है जो ‘होली’ के आध्यात्म का काला इतिहास बन गया। होली से मात्र करीब पांच दिन पूर्व 3 मार्च की सुबह नगर के महलों के नाम पर सिर्फ धधकती आग थी।
प्रो.चिंतामणि शुक्ल का साहित्य गवाह है कि ब्रज के द्वार में होली से चंद दिन पूर्व ही 02 मार्च, 1817 को एक गद्दार ने ऐसी होली जलाई थी 03 मार्च की सुबह किलों और महलों के नाम पर सिर्फ मलवा और आग ही आग थी। यह अग कई सप्ताह तक होली की तरह जलती रही थी। मशलन होली पर्व के बाद भी बारूद की आग धधकती रही थी और कई वर्षों तक नगर में होली पर्व के नाम पर सिर्फ डर और दहशत का माहौल रहा था। प्रो.चिंतामणि के मुताबिक होली से करीब दो सप्ताह पूर्व ही अंगे्रजी हुकमरान मेजर जनरल मार्शल के नेतृत्व में अंगे्रजी फोजों ने 17 मार्च, 1817 को राजा दयाराम के किले पर चढ़ाई की थी और राजा की चातुर्यता और
जबावी बारूदी हमले में अंगे्रजी फौजों को मुंहखी खानी पड़ी थी, लेकिन मार्शल की कूट नीति का यह परिणाम रहा था कि लोभ में आए एक गद्दार की मदद से राजा के बारूद में आग लगवादी थी। जो इतनी भयंकर थी कि उसमें हजारों की संख्या में लोगों ने अपनी जानें गवाई थीं। 03 मार्च, 1817 की सुबह सिर्फ होली जैसी आग और तवाही का मंजर था।

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