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न कलम थी न कागज थे साहित्य और समाज के समागम थे मुन्नालाल रावत

ब्रजक्रांति के संपादक को अंतिम सलाम 
हाथरस। विप्र समाज ने आज अपनी एक ढाल खोदी, पत्रकारिता का एक और स्तंभ ढह गया। पब्लिकेशन का एक पग डीलिट हो गया। समाज और साहित्यिक गलियारे की एक और शमा बुझ गई। एक शब्द को मानो कई वाक्यों मे कहने मतलब ही सिर्फ एक है कि समाज की एक शख्सियत अब नहीं रही। गोलोकवासी हुए मुन्नालाल रावत अब सिर्फ यादों और किस्सों की चर्चाओं में ही श्रवण होंगे।  
        यह उद्गार हाथरस प्रेस क्लब की अलीगढ़ रोड स्थित कार्यालय पर हुई शोक बैठक में व्यक्त किए गए। वक्ताओं ने कहा कि जब-जब बात सख्शियतों की होगी तो मुन्नालाल रावत प्रथम पंक्ति में नजर आयेंगे। वह कहते थे, ' मैं ब्राह्मण समाज का नाई हूं', गलत नहीं था। क्योंकि आज कई ऐसे जोड़े हैं जो अपना खुशहाल जीवन बिता रहे हैं। एक अद्वितीय सख्शियत उनकी यह थी कि भले ही उनके पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन उनके द्वारा प्रकाशित साहित्य से हजारों प्रतिभाओं को शिक्षा का बोध हुआ। एक छोटे से पब्लिकेशन से शुरू किये अपने सफल आयाम को उन्होंने मुंबई नगरिया तक पहुंचाया। भले ही वह सफलता का  उद्घोष ना कर सके, लेकिन 'प्यासे होट' और 'उद्धार' के सेटों पर ब्रजद्वार हाथरस की खनक को मुंबई नगरिया के अनेक कलाकारों ने हींग के तड़का और होली के रंगों को महसूस किया।        प्रथम परशुराम मेला को सफलतम आयाम देकर अपने नाम एक इतिहास कर लिया। यह ही नहीं विप्र समाज,  व्यापारी समाज के अलावा राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान उनकी सख्शियत का एक अंग था। कार्यक्रम की अध्यक्षता अध्यक्ष बीएस जैन व संचालन सचिव संजय दीक्षित एडवोकेट ने किया।        इस मौके पर मुख्य रूप से कार्यालय सचिव भूवेंद्र सेंगर, महादेवशरण 'अटल', कान्हा गुप्ता, पुष्कर कुमार,  राजकुमार, नितिन कौशिक, रामकुमार, उमाकांत पुढीर, संजीव उपाध्याय, अनिल दीक्षित,  शिवम, अनिल चौधरी, जितेंद्र कुमार, मनोज वार्ष्णेय, प्रशांत दीक्षित, सुनील शर्मा आदि अनेक पत्रकार और समासेवी उपस्थित थे।

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