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खून देने वाला जाति, धर्म और आरक्षण की बात नहीं करता, वह तो सेवा करता है जो भारतीय संस्कृति का मूल हैः प्रवीण

खून देने वाला जाति, धर्म और आरक्षण की बात नहीं करता, वह तो सेवा करता है जो भारतीय संस्कृति का मूल हैः प्रवीण
हाथरस 24 अप्रैल। कोई जीवन और मौत के बीच जूझ रहा हो तो उसको आरक्षण नहीं खून की आवश्यकता होती है। खून देने वाला कभी भी आरक्षण नहीं की मांग नहीं करता वह तो ध्यान रखता है इंसानियत का। वह ध्यान रखकता है अपने कर्तव्यों का नाकि आरक्षण की आड़ में रहकर अपने अधिकारों को जताते हुए देश और समाज में अशांति फेलाता है। हमको अपने कर्तव्यों का पालन करना है अपने अपने संस्कारों को निभाना है। हमको रामचरित मानस से मिली मर्यादाओं का पालन करना है।
यह उद्गार समाजसेवी, अच्छी सोच और संस्कार से परिपूर्ण उद्यमी प्रवीण वार्ष्णेय ने सोमवार को एक वार्ता के दौरान उस वक्त दिए जब उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर एक वर्ष की बच्ची को अपना ए पोजिस्टिव खून दिया था। यह आज पहली वार नहीं था जब श्री वार्ष्णेय ने खून का दान दिया हो। वह कई वर्षों से इस सेमाजसेवा में लगे हुए हैं। हमारा प्रश्न था क्या आप खून देते वक्त जरूरतमंद की जाति विशेष पर गौर करते हैं ? उन्होंने बताया कि यह समाजसेवा है। जिसके करने के बाद अतीव आनंदन की प्राप्ति होती है और यह हमको हमारी संस्कृति हमारे मातापिता से मिली है। उन्होंने भी रामचरित मानस में दिए गए मर्यादित जीवन के संदेश और मिले ज्ञान से सीखा था।
दूसरा प्रश्न था कि यह आप क्यों करते हैं ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यह एक दायित्व है। रामचरित मानस हमें यह सिखाता है कि अपने जरूरत पड़ने पर किसी के कार्य आओ। अपने कर्तव्यों का पालन करो। इसलिए ही आज भी लोग परिकल्पना करते हैं रामराज्य की। बुजुर्ग कहते हैं कि रामराज्य में शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। आरक्षण तो अधिकार का मामला है और अधिकार भी उसको मिलता है जो अपने कर्तव्यबोध से पहले गुजर चुका होता है। पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि अब तक वह सौ से अधिक कैंपों और आयोजनों के माध्यम से सैकड़ों लोगों को खून की आवश्यकता की पूर्ति करा चुके हैं और आगे भी इस कार्य में अनवरत लगे रहेंगे। इस मौके पर अधिकार मांगने वालों से भी उन्होंने अपील की कि वह भी अपने भी पहले अपने कर्तव्यों का पालन करें। ऐसा करने से संरक्षण मिलेगा। संरक्षण में प्यार होता है। जय श्री राधे। जय सांवलिया सेठ के जयघोष से उन्होंने अपनी बात समाप्त की और हमें मिली एक सीख कि सेवा में ही मेवा मिलती है।

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