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शब्दों से साहित्य को रच काव्य की कोकिला बनी मौनिका

महिला दिवस पर विशेष...........................
शब्दों से साहित्य को रच काव्य की कोकिला बनी मौनिका
-महिलाओं के उत्थन के लिए करती रहती हैं प्रयास, किडनेपरों के चंगुल से छुड़ाई थी एक छात्रा
संजय दीक्षित
सुरेंद्र शर्मा के साथ मोनिका दहलवी
हरीओम पंवार के साथ मोनिका दहलवी
हाथरस। कोयल सी आवाज, शब्दों का सटीक मिलान और कविता में
छिपा वह संदेश मोनिका को पूरे देश में एक अलग पहचान दिलाता है। महिलाओं और उनकी जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं पर वह अपने साहित्य में ऐसे ढालती हैं कि उनको बदले में हजरों की संख्या में सुन रहे लोगों से मिलती हैं उनको तालियां और वंसमोर की आवाजें।
हम बात कर रहे हैं ब्रज की द्वार देहरी रस की नगरी (हाथरस) में जन्मी उस मात्रशक्ति की जिसने अपने जिंदगी में तमाम उतार-चढ़ाव के बाद भी देश में उन चुनिंदा साहित्यकारों में स्थान प्राप्त किया है
संतोषानंद के साथ मोनिका दहलवी
, जिन्हें आज पूरा भारत जानता है। देश के कौने-कौने में अपने काव्य पाठ से धूम मचा चुकी मोनिका दहलवी
भले ही इन दिनों दिल्ली में अपना कर्मक्षेत्र बनाए हैं, लेकिन ब्रजद्वार की बालाओं व कन्याओं के लिए भी वह कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। साहित्य में जिन बच्चियों का झुकाव है वह स्वयं उनको ट्यूट करना चाहिती हैं। वह महिलाओं के लिए भी समाजसेवा से जुड़े कार्यों के प्रति अग्रिम पंक्ति में रहती हैं। खासकर श्रृंगार रस की प्रधानता के साथ-साथ मोनिका वीर व हास्य और व्यंग्य में भी अपनी लेखनी से नहीं चूंकतीं। उनका एक चर्चित गीत ‘‘फुर्सत हो तो निगाहों की बारात में आ जाओ। तुम्हें चांद देखना हो तो रात में आ जाओ’’ ‘‘ यदि प्यार में हम इतने समर्थित नहीं होते। दुनिया में तेरे नाम से चर्चित नहीं होते’’ उन्होंने देश के प्रख्यात कवियों में हरीओम पंवार, अरुन जैमिनी, सुरेंद्र शर्मा, कुमार विश्वास, विनीत चौहान आदि कवियों के साथ काव्यमंचों को साझा किया है।
कुमारविश्वास के साथ मोनिका दहलवी

देवबंद की तालियां अभी भी नहीं भूली हैं मोनिका
उन्होंने बताया कि हाथरस के हचरनदास कन्य इंटर कॉलेज की वह छात्रा रही हैं। हालांकि उन्होंने स्नातक की शिक्षा दिल्ली यूनिर्वसिटी से ली हैं। उन्होंने हालांकि हाथरस के काका हाथरसी मंच से ही अपनी काव्यपाठ की पारी शुरू की थी। जबकि दिल्ली, गोवा, मुंबई, कोलकाता, देहरादून आदि देश के हर कौने-कौने में अपनी सुरीले काव्यपाठ की मिठास पहुंचा चुकी हैं, लेकिन देवबंद की वह तालियां जहां शायद वह ही एक हिन्दू कवियत्री थीं। करीब 60 हजार की ओडिएंस के बीच वंसमोर-वंसमोर और तालियां उनको आज भी याद हैं।

किडनेपरों की परवाह किए बगैर छुड़ाई थी एक लड़की
मोनिका को 2012 के वह दहशत भरे पल आज भी याद हैं जब वह बरेली जा रही थीं और बदमाशों के चंगुल में फंसी एक लड़की को उन्होंने साहस करते हुए बचाया था। महिला पुलिस की सहयता लेते हुए उन्होंने लड़की को उसके मातापिता तक पहुंचाया था।

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